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अक्षरवर्षा भीष्म उप्रेती सबेरे ही सूरज के पिघलकर गिरने के समय में आज बादल पिघल गया और हथेली भर अक्षर गिर गए धरती पर
बरसात होती तो मैं दरवाजे, खिड़कियां बन्द करता उजाले को बाहर ही छोड़कर कमरे में सिकुड़ जाता पर मैंने खिड़कियां खोल दी खिड़कियों के परदे सरकाए दरवाजे खोल दिए फिर चारों तरफ से एक साथ बाहर निकल गया।
बरसने लगे अक्षर लगातार जमीं पे अक्षर एक दूसरे से मिलकर बने शब्द शब्द मिलकर बने वाक्य बने अर्थ
अक्षरों का संगीत सुनते सुनते संभल नहीं पाया मैं अक्षरों के बीच मैं अक्षर वर्षा से भीगने लगा अक्षर-संगीत और अनुभूति से भीगने लगा तृप्तिका हरा रंग चारों ओर से उठकर चूमने लगा मुझे बेतहासा
कुछदेर बाद मैंने देखा खुले हुए खिड़कियां, दरवाजों से अक्षर भीतर घुसने लगे जल्दी जल्दी फिर कोनो में बिखरे अंधेरों पर धावा बोल दिया।
ओह ! तो क्या वर्षों से प्यासा था मैं ? अब पता चला मेरी प्यास तो अक्षरों के तलाश में थी।
सबेरे ही सूरज के पिघलकर गिरने के समय में आज बादल पिघल गया और हथेली भर अक्षर गिर गए धरती पर।
चुनौती
सफर में पगपग रास्ता रोक खड़े हैं हिमाल से अक्षर
मैं एक यात्री सूर्योदय से चला हूं सूर्यास्त तक पहुंचना है उस मोहक जगह तक जिसकी तस्वीर मैंने दिल में सजा रखी है
मैं चढाई चढ़ता हूं पत्थरों के परतों को कुचलते हुए धूल कुचलते हुए, बरफ कुचलते हुए पर जितना चढाई चढ़ा कहता हूं उतना ही धंसा हुआ हूं अंधेरे और उजाले का संगम गहरा और रोमांचक होता है
कब लांघ पाऊंगा इन अक्षरों को और दूसरे अक्षर चढ़ूंगा कब पैर रखूंगा इस उत्सुकता के शिखर पर और कब तक मीठी नींद सोऊंगा
सफर में पगपग रास्ता रोक खड़े हैं हिमाल से अक्षर।
मूल नेपाली से अनुवादः कुमुद अधिकारी |