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लघुकथाएँ --हरिहर पौडेल द्रौपदी
वह पड़ोस में रहती थी। हमारी दृष्टि मिलती, पर संवाद अभी तक नहीं हुआ था। ... एकदिन मैंने देखा वह युधिष्ठिर के संग दिल्लगी करते हुए पार्क में बैठकर बादाम खा रही थी। दूसरी बार उसके भाइ ने बताया वह भीम के साथ तीन दिन के लिए पोखरा घुमने गई है। फिर मैंने उसे अर्जुन के कमरे से सुबह चार बजे निकलते हुए देखा। उस दिन वह नकुल के साथ रात का शो फिल्म देखने गई थी। फिर अगली बार मालूम हुआ वह सहदेव के साथ खरीदारी कर रही थी। ... फिर कुछ दिनों बाद एक शाम को मैंने उसे एक आदमी का हाथ पकड़कर डिल्लीबजार की चढ़ाई चढ़ते हुए देखा। बाद में पता चला वह दुर्योधन था। ... देश की राजनीति में बड़ी हलचल हो रही थी। पत्रपत्रिकाओं में राजनीति के बारे में पढ़ने का मजा ही कुछ और है। मैं पत्रिका की दूकान में नयी पत्रिका का इन्तजार कर रहा था। जो लड़का पत्रिका लेने कहीं गया था वह अभी तक नहीं आ पहुंचा था। उसी व़क्त वह आ पहुंची और दूकानदार से पत्रिका मांगने लगी। इन्तजार करते करते मुझे लगा क्यों न बातचित शुरू करें- आप......? वह मुस्कुराई- मैं सावित्री। मैं चौंक गया। वह तो इस देश की राजनीति निकली। ....................................................
अपने जितने दिन वह जिन्दा रहा अकेला रहा। अकेले ही जिन्दगी को घसीटता रहा। सोचता- मरने के बाद रोनेवाला भी कोई नहीं । आज उसकी मौत में रोनेवाले बहुत दिखाई दिए। भीड़ में किसी ने कहा- 'यह क्या गजब हुआ !' कहीं से जबाव मिला- 'ये सब उसके साहूकार हैं। ये अपने पैसे डूब जाने की मातम मना रहे हैं।' ............................................. सोच वह जीवनभर सोचता रहा। क्या करना है, कैसे करना है, .......सोचता रहा। अचानक मौत उसके सामने आ गई। वह मौत के बारे में सोचना चाहता था पर उसे मौका ही नहीं मिला। मौत उसे निगल गई। ...........................................
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